मुझे तो लगता ये मेरा विचलित मन है।

मंजर ये आज खंजर से कम नहीं,
कौन कहता है खाक करने का चिंगारी में दम नही,
लौ जलने से शरू हुई,आज आग ये भभक गईं,
कब तक हाथ मे रखोगे जिंदगी,
आज वो मिट्टी , अंगार बन हाथों से सरक गईं,
हाथ दूर रखो वो मिट्टी अब न नम है,
काम ही ज्यादा है या समय ही कम है
मुझे तो लगता ,ये मेरा विचलित मन है।



बोलने को बोलते बहुत कुछ, पर सच बनी एक शर्म है,
कही आग की तपन, कही गई नियत जैसे जम है
कोई लड़ रही है पिंजरे से, कहीं बंधे पर हरदम है
जो सच है वो लगता सब को यहां एक गन्द है
ये सदियो से मिली सोच का आज से द्वंद्व है,
काम ही ज्यादा है या समय ही कम है
मुझे तो लगता, ये मेरा विचलित मन है।



मिट्टी से खड़ा हुआ, मिट्टी पर चल दिया
रौंदता है उसे, जिसने तुझे खड़ा किया
सही को नकारना, तर्कदारो का पुराना ये खेल है
स्वार्थ का तर्को से देखा भयानक जोल मेल है
क्या बदलता वक़्त कहने से गया कभी थम है,
काम ही ज्यादा है या समय ही कम है
मुझे तो लगता ,ये मेरा विचलित मन है।



घटा घट कर हट गई, उसे आसमान का एतबार ना
रहा, बिजलिया कड़क कर बुझ गयी ,
उसे बदलो का अख्तियार ना रहा
धरती ही जान पायी क्यो बादलो की आंखे आज नम है, काम ही ज्यादा है या समय ही कम है                  मुझे तो लगता ये मेरा विचलित मन है।


एक पल कटार सी चमक ,दूसरे पल अंधेरा बेशुमार है,
मन जैसे रोज बदलता अखबार है।
स्वभाव भी लगे कभी सम तो कभी विषम है,
काम ही ज्यादा है या समय ही कम है
मुझे तो लगता ये मेरा विचलित मन है।


पेड़ के पतो से ज़िन्दगी शुरू हुई , 
ताश के पतो ,  डोलते प्यालो और धुँधकते धुंए में जा मिली। ये बाते अब आम है, क्यो बंदीसों का अब नाम
बदनाम है,
कोई समझ के भी क्यो हुआ बेदम है,
काम ही ज्यादा है या समय ही कम है
मुझे तो लगता ये मेरा विचलित मन है।



खिलती इस धरा पर,मंडराता ये आसमान
गाती इस हवा में, सूरज का ये अभिमान
साख से गिरता वो पता , क्या हवा की है ये खता
देखने को क्या ये अचरज कम है
जिंदगी की उलझन में ये प्रश्न ही गुम है
काम ही ज्यादा है या समय ही कम है
मुझे तो लगता, ये मेरा विचलित मन है।

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