माँगने की आदत में कुछ ऐसा किया,
बिखारी अध्यात्म जान भिक्षु बन गया।
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कुछ माँगन बुरा लगता है जब वे अज्ञानी होते है, मासूम होते है। फिर वे ज्ञानी हो जाते है उन्हें माँगना इतना चोट नहीं पहुँचाता। मतलब किसी तरह माँगने को मन में जायज ठहरा ही लेते है।
जैसे मेरा ही उदाहरण लो , मैं बेबस हूँ, बेचारा हूँ , दो अध्यात्म के वीडियो देख खुद को शांत करूँगा और माँगता रहूंगा। पर जी जान से प्रयास, महनत नहीं करूंगा।
तुम्हारा उदहारण लो, मैं लड़की हूँ, लोगो की बहुत पाबन्दी है, काम नहीं कर सकती तो घर से मागना ही पड़ेगा, फिर घरवाले से। लेकिन जो विकल्प है उनके साथ महनत कौन करे।
समझ गए होंगे?
(किसी ने explain करने को बोला था।😊👍)